सोलहवीं शताब्दी में सबसे पहले लगा था लॉ’कडा’उन, कोरो’ना जैसे…

इन दिनों देश भर में चुनाव से भी ज़्यादा कोरो’ना की लहर है। स्थिति ये है कि एक बार फिर से पूर्ण लॉ’कडा’उन लग सकता है। आपको बता दें कि भले ही आप ये सोच रहे हैं कि ऐसा पहली बार हुआ है लेकिन लॉ’कडा’उन का ये चलन कई सदियों पुराना है। ये वो वक़्त था जब हैजे से बचा’व के लिए एक फ्रेंच द्वीप माल्टा में लॉ’कडा’उन लगा था। ये हुआ था सोलहवीं शताब्दी में।

सिसली और उत्तरी अमेरिका के बीच स्थित द्वीप देश माल्टा में सोलहवीं सदी में लॉकडाउन लगा था. तब फ्रेंच बोलने वाली आबादी में सैनिकों के चलते एकदम से हैजा फैला और धड़ाधड़ मौतें होने लगीं. जल्द ही पाबं’दी लगा दी गई. स्वस्थ सैनिकों को इस काम के लिए तै’नात किया गया कि वे लोगों को यहां से वहां जाने से रो’कें. रो’कथाम के लिए कं’टेनमें’ट जो’न थे, जिन्हें cordon sanitaires कहा जाता था. ये एक फ्रेंच टर्म है, जिसका मतलब है लोगों की आवाजाही पर प्रतिबं’ध।


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ब्रिटिश इंडिया में भी लोगों को रो’कने के लिए सेना का इस्ते’माल होता था. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक तब सिर्फ उन्हें ही इसमें ढी’ल मिलती थी, जिनके पास एक खास काग’ज होता था, जिसे प्ले’ग पासपो’र्ट कहा जाता था. इसमें लिखा होता था कि वे प्ले’ग से पूरी तरह से मु’क्त हैं. सड़क पर निकलते हुए उन्हें ये काग’ज साथ रखना होता था और हर दूसरे दिन सेहत की जां’च करवानी होती थी.

बता दें कि 19वीं और 20वीं सदी में है’जा और प्ले’ग बीमा’रियां आ’म थीं. ब्रिटिश का’ल के दौरान भी है’जा कई चर’णों में फै’ला. तब घबराई हुई अंग्रेज सरकार ने प्रभावित इलाकों में लॉ’कडा’उन का नि’र्देश दे दिया. हालांकि तब इसे लॉ’कडा’उन की बजाए हॉ’लीडे कहा जाता था. नवाब शासित हैदराबाद में भी इन दोनों बीमा’रियों के लिए मिलती-जुलती व्यवस्था थी. तब भी लॉ’कडा’उन, कं’टेनमें’ट जो’न, आइसो’लेश’न और प्रवा’सियों के साथ बीमा’री फै’लने का ड’र हुआ करता था.

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इन दौ’रान अपनाए जाने वाले तरी’कों के दस्तावेज भी है. जैसे अंग्रेजों ने हॉ’लीडे टर्म अपनाते हुए लोगों को क्वा’रंटा’इन में रखा था, इसका जि’क्र ब्रिटिश इंडिया के आ’धिकारि’क रि’कॉर्ड National Archives of India (NAI) में मिलता है. इसके अलावा ब्रिटिश इंडिया मेडिकल हि’स्ट्री पर आर्काइव में पता चलता है कि कैसे अंग्रेजों और निजाम ने ट्रेनों और झुं’ड बनाकर यहां से वहां जाने वालों के लिए मना था कि उनसे संक्रा’मक बीमा’रियां फै’लती हैं, खासकर है’जा. ऐसे में जैसे ही किसी खा’स हि’स्से में बीमा’री फै’लने की खबर मिलती, उस जगह से दूसरी जगहों का सं’पर्क लगभग काट दिया जाता था.

शहरों में काम करने के लिए आए मजदूर बड़ी संख्या में लौ’टे तो अपने साथ बीमा’री लेकर लौ’टेंगे. इस आशंका को देखते हुए ब्रिटिश इंडिया में अलग ह’ल निकाला गया. तब मजदूरों को उनके घरों के आसपास या लगभग तीन किलोमीटर के दा’यरे में काम दिलवाने की कोशिश होती. इस दौ’रान वे अपने इलाके से बाहर नहीं जा सकते थे. साथ ही मजदूरों को 32 दिनों की तनख्वाह पहले ही दे दी जाती थी. इसका जिक्र साल 1897 के फाइल नंबर 120 (शिमला रिकॉर्ड्स) में मिलता है। जो डिपार्टमेंट ऑफ रिवेन्यू और एग्रीकल्चर के पास उपलब्ध है।

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इसके मुताबिक साल 1897 की 20 मार्च को इलाहबाद में एक मी’टिंग हुई, जिसमें अंग्रेज सरकार ने हॉ’लीडे (अब लॉ’कडा’उन) पर बात की. संक्रा’मक बीमा’री फै’लने के दौ’रान मजदूरों को मिलने वाली इस छुट्टी में उन्हें अग्रि’म तनख्वाह के साथ महीने भर घर रहना होता था और अपनी सेह’त का खयाल रखना होता था. प्रवासी मजदूरों को छोटे-छोटे समूहों में या ज्यादा से ज्यादा 500 लोगों को एक साथ अपने गांवों की तरफ भे’जा जाता था।

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