प्लेन में च’ढ़े थे 116 यात्री उत’रे 117, 38 हजार फीट ऊंचाई पर जो हुआ वो है’रान कर देगा

बेंगलुरु से जयपुर आ रही इंडिगो एयरलाइंस की फ्लाइट में बुधवार को 38 हजार फीट की ऊंचाई पर पैदा हुआ बच्चा पूरी तरह स्वस्थ है। मां ललिता के साथ फिलहाल वह ब्यावर के जेवाजा गांव स्थित अस्पताल में भर्ती है। एक-दो दिन में घर के लिए छुट्‌टी मिल जाएगी। बेंगलुरु में ऑटो रिक्शा ड्राइवर भैरो सिंह पत्नी ललिता की डिलीवरी अपने घर पर ही कराना चाहते थे। डॉक्टर ने एक महीने का समय दे दिया था और बताया था कि फ्लाइट में लेकर जाओ, कोई दिक्कत नहीं है। ऐसे में जब पति के साथ ललिता ने फ्लाइट में उड़ान पर थी तो अचा’नक लेबर पेन हुआ। क्रू मेंबर्स की मदद से जयपुर आ रही एक डॉक्टर यात्री ने प्रसव कराया। जिस समय विमान ने जयपुर एयरपोर्ट पर लैंडिंग की पोजिशन ली, ललिता का बेटा एक क्रू के हाथ में किलकारियां भरता हुआ दिखाई दिया। मां ललिता ने अपनी आपबीती शेयर की। पढ़िए पूरी कहानी ललिता की जुबानी…

I Saw The Miracle Of God In The First Flight Itself

डॉक्टर ने कहा था- आप फ्लाइट से जाइए, कोई दिक्कत नहीं

मैं पहली बार विमान में बैठी थी। डॉक्टर ने कहा था कि अभी कोई दिक्कत नहीं है। आप फ्लाइट में जाइए। मेरे पति के साथ मैं विमान में बैठ गई। वहां मैंने एयर हॉस्टेस को पहले ही बता दिया था कि मैं अपने गांव डिलीवरी कराने के लिए जा रही हूं। इसलिए वे पहले से ही सजग थीं और बार-बार मुझसे पूछ रही थीं कि आपको कोई दिक्कत तो नहीं। उड़ान के करीब एक घंटे बाद मैं वॉशरूम गई तो मुझे कुछ गड़बड़ लगा। ब्ल’ड की शिका’यत पर मैंने क्रू को बताया। उन्होंने तुरंत संभाला और अनाउंस किया- विमान में कोई डॉक्टर है तो तुरंत संपर्क करें। पूरे विमान में हलच’ल मच गई। कयास लगाने लगे कि पता नहीं क्या हो गया। मैं 10-ए सीट पर थी और एक डॉक्टर सुबहाना न’जीर 10-सी सीट पर बैैठी थीं। वे तुरंत उठीं और मुझ तक पहुंचीं।

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जिसकी मैंने कभी कल्पना नहीं की, वो हो रहा था

मैं घ’बरा गई थी। जिसके बारे में कल्पना भी नहीं की थी, वो हो सकता है। ऐसा सोचकर भी रू’ह कां’प उठी थी। पति परे’शान थे। अब क्या होगा? मैं तो खुद को संभाल पाने की स्थिति में नहीं थी। यहां तो कोई हॉ’स्पिटल भी नहीं है। उड़ता विमान, लेबर पेन, बच्चों की शक्लें, जीवन-म’रण की परि’स्थिति’यां, सब आंखों के सामने जैसे मंड’राने लगी थीं। बात-बात पर ध्यान रखने वाले पति अस’हाय थे। पता नहीं विमान कितनी देर में जयपुर लैंड करेगा। उससे पहले आखिर क्या होने वाला है। कोई नहीं जानता था सिर्फ ईश्वर के। क्या होगा मेरे बच्चे का भविष्य? जिसको सकुशल जन्म देने के लिए मैंने इतना ऊंचा उड़ने की रि’स्क ली। क्या वह इसी ऊंचाई में मुंह दिखाएगा। सवालों पर सवाल खड़े हो रहे थे और दिलासों और भरोसे का आशीर्वाद मुझे वहां मौजूद यात्रियों में से बीच-बीच में मिलता जा रहा था।

मैंने सब कुछ ऊपर वाले पर छोड़ दिया था

विमान में मौजूद एकमात्र डॉक्टर परिस्थि’ति को भां’प चुकी थीं। क्रू मेंबर्स ने भी इस तरह की स्थिति का संभवत: पहली बार साम’ना किया था। इसलिए वे ज्यादा सत’र्क तो थीं, लेकिन थोड़ी टेंशन में भी थीं। शुरू में उन्होंने मुझे वॉक करने को कहा, लेकिन जब पे’न ज्यादा हुआ तो उन्होंने मुझे सीट पर ही ले’टने को कह दिया था। डॉक्टर ने अपना काम शुरू कर दिया था। क्रू ने जरूरी सामग्री उपलब्ध करा दी थी। देखते-देखते विमान के बीच वाले हिस्से को पूरी तरह खाली कर दिया गया था। पुरुषों को आगे और पीछे की ओर भेज दिया गया। महिलाएं मेरे चारों ओर घे’रा बना चुकी थीं। मैं समझ चुकी थी कि अब हॉ’स्पिटल पहुंचने से पहले ही डिलीव’री की तैयारी है, लेकिन इसके अलावा कोई विकल्प भी मुझे नजर नहीं आ रहा था। इतनी ऊंचाई पर सब कुछ ऊपर वाले के हाथ छो’ड़ दिया था।

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टेकऑफ करने के दो घंटे बाद विमान में बच्चे की लैंडिंग

विमान में 116 यात्री थे। करीब एक घंटे बाद ले’बर पे’न शुरू हुआ और करीब दो घंटे बाद विमान में बेटा हुआ। यानी जब विमान ने लैंड किया तो यात्रियों की संख्या 117 हो चुकी थी। जब डॉक्टर और क्रू मेंबर्स अपना काम कर रहे थे, मैं लगातार ईश्वर को याद कर रही थी। क्या होने वाला था यह तो पता नहीं था, लेकिन मुझे धीरे से बताया गया कि जयपुर एकदम न’जदीक है और विमान लैंडिंग की पो’जिशन ले रहा है। ते’ज पे’न के बीच हल्की-हल्की यह आवाज अगले ही क्षण किलकारी में बदल गई। तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मैंने देखा- मेरा ‘आकाश’ डॉक्टर के हाथों में था। यह मैं सपना तो नहीं देख रही। पति ने बताया कि सपना नहीं, तुझे बेटा हुआ है। मेरे लिए तो यह सिर्फ चमत्कार ही था।

यात्रियों ने बोला- हम सबके लिए एक यादगार पल, जो एक लंबी कहानी बन गया। किस्सा बन गया, हर यात्रा में पड़ोस के यात्री को बताने का, घर के हर सदस्य, मित्रों को बताने का।​​​​​​ ललिता के पति भैरो सिंह ने बताया कि इंडिगो स्टाफ ने लैंड करने से पहले ही एयरपोर्ट को सू’चना दे दी थी। यहां एंबु’लेंस तैयार थी तो हम ललिता को लेकर एंबु’लेंस से ईएचसीसी अस्पताल पहुंच गए। प्राइवेट अस्प’ताल होने के कारण यहां का ख’र्च ज्यादा था, इसलिए हम सिर्फ आधा घंटे में ही ललिता को गांव जैवा’जा के अस्प’ताल ले गए। यह हमारे गांव जाली रूपावास के पास ही पड़ता है, जो ब्या’वर कस्बे में है।

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