मैं ज’नाज़ा नहीं पढ़ने दूँगा जब तक मेरा उधा’र नही चु’काया जाएगा… बेटी आई और बोली मेरा सब कुछ….

एक गांव में एक बुज़ुर्ग व्यक्ति का दे’हांत हो गया ज’नाजा तैयार हुआ लोग उठा कर क’ब्रस्तान ले जाने लगे। क़’ब्रिस्तान के नज़दीक श’व रख कर जैसे ही इ’स्लाम ध’र्म के अनुसार न’माज़ ए ज’नाज़ा पढ़ाये जाने की प्राक्रिया शुरू होने वाली होती है तभी वहाँ मौजूद एक आदमी आगे आया और चारपाई का एक पाया पक’ड़ लेता है और दावा करता है की कि म’रने वाले पर मेरा 15 लाख रुपया उधार है पहले मुझे मेरा उधार पैसा दो उसके बाद ही मैं इसको दफ’न करने दूंगा.

अचान’क ऐसा मामला पेश आने से ज’नाज़े में मौजूद लोग स’कते में आ गए और सभी लोग ह’क्काब’क्का ख’ड़े होकर एक दूसरे का मुँह देखने लगे की अब क्या किया जाए। दरअसल हुआ यूँ की उन मृ’तक व्यक्ति के चार ल’ड़के थे तथा एक ल’ड़की थी पिता ने अपनी ज़िंदगी के आखरी वक़्त में अपनी तमाम प्रॉपर्टी इन चार बेटों के नाम कर दी और बेटी को कुछ भी ना दिया क्योंकि हमारे यहाँ यही रिवा’ज है कि लड़की पराई होती है जबकि इ’स्लाम ध’र्म कहता है कि लड़कियों का हिस्सा दिया जाना चाहिए एवं पवि’त्र पु’स्तक कु’रान पाक में भी लड़कियों के हिस्से देने के लिए बताया गया है।पिता की प्रॉपर्टी में जितना हिस्सा लड़की को मिलेगा लड़के को उसका दुगना हिस्सा दिया जाना होता है।


उधार के पैसे माँग रहे व्यक्ति की बातें सुनने के बाद मृ’तक के बेटे ने कहा म’रने वाले ने हमें तो कोई ऐसी बात नहीं बताई है कि उसका किसी के यहां क़र्ज़ इसलिए हम नहीं दे सकते।म’रने वाले के भाई ने कहा कि जब बेटे जिम्मेदार नहीं तो हम क्यों दें।ये सब होता देख ज’नाज़े में शामिल तमाम लोग खड़े होकर तमाशा देख रहे थे।श’व रखी चारपाई अब तक पड़ी हुई थी जब काफी देर गुजर गई तो ये बात घर की औरतों तक भी पहुंच गई।

ये ख़बर म’रने वाले की बेटी को पता चली और बेटी ने क़र्ज़ की बात सुनी तो फौरन अपना सारा जेवर उतारा और अपनी सारी नकद जमा राशि उस आदमी के लिए भिजवा दी और कहा अ’ल्लाह के लिए यह रकम रख लीजिए और जेवर बेच दीजिये उसके बाद भी जो कम पड़े मैं अपना घर बेचकर उसको अदा कर दूंगी लेकिन मेरे पिता की नमाजे जनाजा पढ़ने दीजिए।

बेटी का ये जवाब आते ही उधारी का दावा करने वाला शख़्स खड़ा हुआ और मौजूद भी’ड़ में खड़ा होकर एलान किया कि असल बात यह है की 1500000 मुझे लेना नहीं था बल्कि जो शख्स म’रा है उसका मेरे पास कर्जा था उसको मुझे 15लाख देना था मुझे यह नहीं पता चल पा रहा था कि इसका असल वारिस कौन है इसलिए मैंने ये चाल चली।अब मुझे पता चल गया है उसकी वारिस एक बेटी है उसका ना कोई बेटा है और ना उसका कोई भाई है।

ये सुनते ही वहाँ मौजूद मृ’तक के भाई और बेटे श’र्म से उधारी का दावा करने वाले शख़्स को हैरत भरी नज़रों से देख रहे थे।ये वाक़या आप सबसे साझा करने का सिर्फ़ इतना उद्देश्य है की बेटियों को बोझ और पराया धन नही समझा जाना चाहिए।बल्कि बेटियाँ घर का मान,सम्मान और शान होती हैं एवं बेटियों वाले खुशनसीब होते हैं लिहाजा बेटी की पैदाइश पर खुश होना चाहिए गमगीन नहीं।

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